युगों पहले की बात है… देवलोक में इलेक्शन की तैयारियां चल रही थी. दुर्वासा ऋषि को चुनाव की निगरानी करने की जिम्मेदारी दी गयी थी. देवलोक की सभी सीमाएं सील कर दी गयी थीं ताकि कोई असुर चुनाव में विघ्न न डाल सके।
सारी तैयारियों और कड़ी सुरक्षा के बावजूद एक असुर वेश बदल कर देवलोक में घुस गया. सुन्दर मुख, घनी मूँछ, तेल लगा कर सफाई से बने बाल देख किसी को शक भी नहीं हुआ कि वो सुर नहीं बल्कि एक असुर है।
वैशाख उत्सव के दिन सभी देवता, देवी, अप्सराएं हर्षोउल्लास के साथ अपने मतदान का प्रयोग कर रहे थे तभी उस देव रूपी असुर ने चुनाव यंत्र में गड़बड़ी का आरोप लगा दिया।
इतना भीषण आरोप सुनकर देवलोक की धरती काँप उठी, तेज हवाएं चलने लगी सभी ओर हाहाकार मच गया। अपनी निगरानी में हो रहे चुनाव पर ये आरोप सुन ऋषि दुर्वासा अत्यंत क्रोधित हो उठे. अपनी शक्तियों से उन्होंने उस देव रूपी असुर को पहचान लिया।
क्रोध में ऋषि दुर्वासा ने उस दुष्ट असुर को शाप देते हुए कहा – रे नीच, पापी, कपटी, दुष्ट, अधम! तूने देवलोक की मर्यादा और मेरी विश्वनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगाया है. जा मैं तुझे शाप देता हूँ कि कलियुग में तू ‘केजरीवाल‘ के रूप में जन्म लेगा।
इतना भीषण शाप सुनकर असुर ऋषि दुर्वासा के पैरों में गिर पड़ा कर गिड़गिड़ाने लगा – त्राहिमाम ऋषिवर त्राहिमाम ! मुझे मृत्यु दे दीजिए मगर ऐसा शाप ना दीजिये।
ऋषि दुर्वासा का दिल पसीज गया और उन्होंने कहा – मैं दिया हुआ शाप वापस नहीं ले सकता लेकिन तुझे एक वरदान देता हूँ. कि तू इस सब के बावजूद पूरे ब्रह्माण्ड में ‘युगपुरुष‘ के नाम से प्रसिद्ध होगा।
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